गर्मियों के वो दिन (पल्लवी के साथ)

(inspired by Roger McGough’s ‘Summer with Monica’)
.
गए साल गर्मी अधिक थी
दिल्ली में !
मैं पल्लवी से बस चंद महीने पहले मिला था,
और हमने बस यूँ ही
बातों बातों में
पहाड़ों पर जाने की ठान ली !
ज़िंदगी दुबकी पड़ी थी वातानुकूलित कमरों में
पर पल्लवी को खुली हवा अच्छी लगती थी
और मुझे पल्लवी !
इसलिए हमने गर्मियों के वो दिन
पहाड़ों पर बिताये !
पल्लवी सारा-सारा दिन
नदी के किनारे
किताबें पढ़ा करती थी
और मैं सारा-सारा दिन उसे
देखा करता था !
उसकी छोटी-छोटी आँखें न जाने क्या पढ़कर
उदास हो जाया करती थीं
बीच-बीच में !
और फिर जब वो कभी नहाकर
पेड़ों की छाँव में लेटी
न जाने क्या सोचकर
खुद में ही हंसती रहती थी,
मैं उसके गालों पे पड़े भंवर देखकर
खुद में ही मुसकाया करता था !
बस ऐसे ही मौसम कब बीत गया,
पता भी न चला !
मैं पल्लवी को कभी ये भी नहीं बता पाया
कि उसकी छोटी आँखें कितनी खूबसूरत हैं
उसकी खुशबू कितनी आकर्षक,
उसकी हंसी कितनी खिली-सी,
और न जाने कितनी और बातें !

—— * —— * —— * ——

अब मैं दिन-दिन भर अपनी balcony में बैठा
बरसात को देखता हूँ !
पल्लवी, ज़ाहिर-सी बात है, मेरे साथ नहीं है !
वो विधिवक्ता है – वकील,
न जाने मैं अब उसके बारे में इतना
क्यूँ सोच रहा हूँ !
शायद इसलिए क्यूंकि जब मैं
इन बूंदों से भीगी पल्लवी की कल्पना कर रहा हूँ,
वो किसी उदासीन न्यायाधीश के सामने
बहस कर रही होगी !
बरसात इस साल कुछ ज्यादा है
ठीक बीती गर्मियों की तरह,
और मैं अब भी वहीं कहीं किसी पहाड़ पर
एक नदी के सामने,
एक पेड़ के नीचे अटका हूँ,
और सोचता हूँ कि न जाने
अगले साल गर्मियां कैसी होंगी !!!

    • shekhar
    • April 3rd, 2010

    awesome!!!

  1. I kp reading it….again and again……there is sme soothing effect in this 1….
    good 1

  1. No trackbacks yet.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 63 other followers