Archive for the ‘ हिंदी ’ Category
आज फिर एक बार मन ने एक उड़ान भरी आज फिर एक बार बड़े ज़ोर से मैं नीचे गिरा | . ऊपर से - सब कुछ बहुत छोटा मगर कितना खूबसूरत; मैं सबसे बड़ा मगर इस विस्तीर्ण अंतराल में कितना छोटा, कितना निरर्थक, और फिर अचानक अविरल गिरने का डर - उफ्फ़, बहुत भयानक ! [ READ MORE ]
उसकी बड़ी-बड़ी बोलती आँखों के ये बड़े-बड़े बोलते आँसू | . मैंने सोचा कुछ हुआ हो कहीं ! उससे पूछा – “दुखी हो?” काँपती गीली आवाज़ में बोली - “नहीं, बिलकुल भी नहीं |” . मुझे विश्वास नहीं हुआ - करीब से उसके चेहरे को जांच-परख कर देखा, उसकी भीगी पलकों पर अपने होठों को रख [ READ MORE ]
बेहद थक गया हूँ अलग-अलग चेहरे पहनते-पहनते, बदलते-बदलते; अपने ही चेहरों की भीड़ में खो गया हूँ इस कदर कि उलटा-पुलटा हो गया है सब, कौन-सा मुँह लिए जाना कहाँ है ? . ख़ुशी के मौके पर मातमी चेहरा लिए पहुँच जाता हूँ लोगों के उत्सवों में और खराब कर देता हूँ सबका मूड तो [ READ MORE ]
कहीं कुछ अटक गया है बहुत भीतर . जी मितलाता है उलटी-सी आती है निकलता कुछ नहीं मगर बहुत देर हुई हलक में ऊँगली डाल-डाल कर थक गया हूँ . कहीं कुछ अटक गया है बहुत भीतर . निकलेगा ज़रूर मगर वक़्त लगेगा (कमबख्त निकलेगा कैसे नहीं) फिलहाल तो लगता है जैसे वक़्त भी अटक [ READ MORE ]
पहले खुद आकर लोग पूछ जाते थे हाल-चाल और अब राह चलते नज़र बचाकर निकल जाते हैं लोग . खैर तब वक़्त अलग था (बेहतर था) अब बात दूसरी है . लगता है उन्हें कन्नी काटना उनका देखा नहीं मैंने टोक भी देता मगर खुद की इज्ज़त का तकाज़ा है सो चुप रह जाता हूँ [ READ MORE ]
एक छिनाल है ज़िंदगी पर मैं उस से मोहब्बत करता हूँ बेइन्तहा मोहब्बत उसके मेरे अलावा भी कई आशिक हैं और वह सबके पास जाती है . कहता हूँ उस से क्या ज़रुरत है उसे जाने की यहाँ वहाँ भला कौन करता होगा और ऐसी मोहब्बत उस से . कहती है क्यूँ न जाऊं खूब [ READ MORE ]
ये बार-बार पीछे मुड़ कर क्या देखते हो, अतीत के गुबार में क्या ढूंढते हो? तुम जिस जगह खड़े हो, वहीं तुम्हारे कदमों तले वो सारे रास्ते सिमटे पड़े हैं जिनपर तुम चले हो आजतक ! . ये पलकों पर हथेलियों का साया रखकर भविष्य की धूप की चौंध में क्या भाँपते हो? ज़िंदगी ठीक तुम्हारे [ READ MORE ]
मैं जहाँ काम करता हूँ वहाँ एक चपरासी भी काम करता है, कभी कभी मुझे लगता है वह अपना काम शायद ज़्यादा मन लगाकर करता है बनिस्पत मेरे ! जब भी मैं उसे आते-जाते corridor में पूछता हूँ ‘और भैया, कैसे हो?’, वह दोनों हाथ जोड़कर कहता है, ‘बस मालिक, सब आप बड़े लोगों की [ READ MORE ]
किसका दर्द है . क्यूँ इस कदर लावारिस पड़ा है किसका दर्द है . फटा-पुराना लत्ता है बीच राह पड़ा है आने-जाने वाले अपनी धुन में चलते-चलते कुचल जाते है पाँव तले किसका दर्द है . हमेशा इतना बेजान था क्या किसका दर्द है . कभी किसी के जिगर का टुकड़ा रहा होगा माँ की [ READ MORE ]
रात की खाली आँखों में क्यूँ बिना नागा हर रोज़, काजल की जगह अँधेरा मला होता है ? . क्यूँ नहीं जाकर चाँद झाँक आता है एक बार उसके कोठे पर जहाँ हर दिन बस अमावस का होता है इंतज़ार ? . खड़ी है बीच बाज़ार अपना थुथला जिस्म उघारकर, क्यूँ, कौन सोयेगा आज इस [ READ MORE ]
एक कैमरे ने मुझे क़ैद करने की कोशिश की तो मैं मुसकुरा भर दिया, उसे क्या पता के मुझे तो न जाने कब से, उनकी नज़रों ने क़ैद कर रखा है...
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