तुम और दर्द-ए-दुश्मन


तुम गए, पर सच कहें तो कमी हमें नहीं खलती,
भर दिया है तुम्हारी याद से, हर ख़ाली कोने को !
खलती है तो बस एक तुम्हारी हँसी की ग़ैरहाज़िरी
तकलीफ़ें तो ज़िन्दगी में कई और भी होंगी, होने को !!
.
दर्द से हमारी अब रोज़ जंग छिड़ती है गोया,
हार मान कर रो देते हैं, तो फ़रेबी बह जाता है !
और अगर ठान लें कि हम लड़ेंगे, रोयेंगे नहीं,
कमबख्त नासूर-सा सीने में ही रह जाता है !!
.
हम तो समझे नहीं यह भी, कि दर्द दुश्मन है हमारा,
या, हम इस लड़ाई में बन बैठे ख़ुद के दुश्मन हैं !
पहले काट लेते थे वक़्त, जो साथ होता था अपना ,
अब इस मुद्दे पे आप-अपने-से ही हमारी अनबन है !!
.
ख़ैर, तुम्हारे बारे में तो अब सोचते भी हैं उतना ही,
ख़यालों की सरहद पे हमारा इख्तियार जितना है !
लेकर हमारा नाम, महफ़िल में शर्मिन्दा मत होना,
कोई न जानेगा, न तुम जानोगे, कि प्यार कितना है !!
    • Ankit
    • मार्च 15th, 2010

    Bahut hi badhiya, Abhishek! Jiyo…..

    “पहले काट लेते थे वक़्त, जो साथ होता था अपना ,
    अब इस मुद्दे पे आप-अपने-से ही हमारी अनबन है !!”

    Bahut hi achhe!

  1. खलती है तो बस एक तुम्हारी हँसी की ग़ैरहाज़िरी
    तकलीफ़ें तो ज़िन्दगी में कई और भी होंगी, होने को !!

    ………. !!!!

    • Vivek Anand
    • अगस्त 7th, 2010

    very nice post.

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