दिन – तुम्हारे साथ, तुम्हारे बिन


गर्मियों की लू के थपेड़ों से बचने को
airconditioned कमरों में ही
डूबते हुए दिन,
लम्बे वक्तों को यूँ ही गुजारते खाली
ऊबते हुए दिन !
सर्दियों में धूप के इंतज़ार में
रजाई में दुबके,
और कहीं जो धूप निकले तो
उजले चमकीले दिन !
पतझड़ में गिरते पत्तों को तकते
आसमान-से नीले दिन,
और बरसात में किसी की याद से भीगते
गीले-गीले दिन !
कभी थके-हारे
तो कभी ऊर्जा से भरे नाचते दिन,
कभी बेवजह इनाम बाँटते
तो कभी कड़े निरीक्षक से जांचते दिन !
कभी पल-पल हो जाए भारी,
ऐसे दिन,
तो कभी पल में ही गुज़र जाते हों
जैसे दिन !
ये सब मैं सुनता हूँ लोगों से
कि कैसे बीते उनके मौसम
और फिर करता हूँ अपना लेखा-जोखा,
रखता जाता हूँ गिन-गिन !
दो ही श्रेणियां बनती हैं बस
जो तुम्हारे साथ पल में ही निकले थे
पहले, वो एक तरफ,
और ये जो एक युग से लगते हैं
तुम्हारे बिन !!
  1. बहुत अच्छा लिखा है. ये सच है की कभी कभी लगता है की ज़िंदगी कुछ ऐसे ही जी है. वो पल जो उनके साथ बिताये और एक समय जो इतना लम्बा लगता है, जो काटे नहीं कटता .

      • abhishektheoutsider
      • मार्च 25th, 2010

      thank u so much Shivangi …a fellow writer would indeed understand… read your poems… liked Tum Ho …. what do u do apart from writing?

  2. i am a mass comm graduate, currently preparing for masters in journalism.

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