ईमानदार जानवर


मेरे अन्दर कहीं
एक ईमानदार जानवर है
जिससे नफरत करते हैं सब
मगर जब भी आदमी बनने का
ढोंग करता है वह
सबको अच्छा लगता है !
हालांकि मुझको जंचता है
उसका वही हिस्सा
जो बुरा
पर सच्चा लगता है !
जो ज़बरदस्ती कभी
हँसता नहीं किसी और के लिए
ना ही खामखा किसी और के दुःख में
आह भरता है,
पहले शायद वह सोचता भी था
कि क्या सोचेंगे सब
पर अब इसकी भी नहीं
परवाह करता है !
जंगल की ज़िंदगी मुश्किल ज़रूर
पर आब-ओ-हवा यहाँ
कहीं बेहतर है,
और उससे भी भला यह कि
दूर बहुत यहाँ से
मुखौटों का शहर है !

  1. Bahut khoob!

    …दूर बहुत यहाँ से
    मुखौटों का शहर है !

    Kitane din reh payenge kavi is shahar mein?🙂

  2. Sorry, I meant to ask- Kitane din reh payenge kavi is jungle mein?
    🙂

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