क्रांति


थकान का पैरहन उतार दो comrade,

अभी बहुत कुछ बदलना है !

भूले नहीं हमारा manifesto –

सबसे प्रबल क्रांति उस मुसकान में होती है

जो हर रुकावट के खिलाफ

होठों पर बनी ही रहती है !

तो बजता रहे क्रांति का बिगुल

और सजी रहे यह मुसकुराहट यूँ ही,

कि अभी बहुत कुछ बदलना है !

  1. नमस्कार सोच का सकारात्मक स्वरूप भला लगा। शुभकामनाओं सहित कृष्ना

    • Ashok Kumar Verma
    • फ़रवरी 9th, 2012

    नमस्‍कार महोदय,

    आपकी उक्‍त पंक्तियों ने निराश मन में फिर से उर्जा का संचालन कर दिया
    और मैं फिर से चल पड़ा हूँ, अपनी चिर-परिचित मुस्‍कान को अपने अधरों पर सजाकर,
    क्रांति का आगाज़ जरूर होगा,
    थकान को उतारकर, नित दिन होगा।

    तब तक, जब तक कि अधरों की मुस्‍कान बनी रहेगी।

    आपका बहुत – बहुत धन्‍यवाद।।

    अशोक कुमार वर्मा
    जबलपुर (म.प्र;)

      • abhishektheoutsider
      • फ़रवरी 9th, 2012

      अशोक जी, धन्यवाद | आपको कविता अच्छी लगी जानकर बहुत खुशी हुई | और लिखूंगा |🙂

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