तुम्हारी यादों का सफ़र : एक नज़्म


शब-ए-फ़िराक़ का आखिरी पहर, आँखें बोझिल हैं,

पर नींद की नदी का रास्ता रोक रखा है

दर्द के इस कोहे-गराँ ने, आने न देगा !

ज़ेहन-ए-वहशी दरकिनार कर दे भले ही तुम्हें

अपने खयालों के बज़्म से, जबरन,

अपना दिल ही बेवफ़ा है मगर, जाने न देगा !!

.

चाँद अपना सफ़र ख़त्म कर के चला,

तुम्हारी यादों का सफ़र मगर अजल तलक है

और हम ताउम्र बिना गिला-शिकवा चलते रहेंगे !

सुब्हे-विसाल हो कि न हो, चाँद आये न आये,

न शब-ए-हिज्राँ से शिकायत है न खाली दिन से हमें,

हम तो रोज़ तेरी तलाश में यूँ ही निकलते रहेंगे !!

शब-ए-फ़िराक़ = जुदाई की रात
कोहे-गराँ = बड़ा पहाड़
ज़ेहन-ए-वहशी = घबराया हुआ दिमाग
अजल = मृत्यु
सुब्हे-विसाल  = मिलन की सुबह
शब-ए-हिज्राँ = जुदाई की रात
    • nupur
    • मई 22nd, 2010

    “yahaan sab log kehte hain meri ankhon mein ansu hai,
    jo tu samjhe toh moti hai ,jo na samjhe toh pani hai..”
    by kumar vishwas.

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