उठने की कोशिश


गिरा तो लगा

बड़ा आसान होता है गिर जाना !

बस एक बार पाँव के तले

ज़मीन खिसकने की देर

और …

कितना आसान होता है गिरना !

.

कोई भी  गिर सकता है –

चाह कर या बिना चाहे,

अपने आप

या परिस्थिति के धक्के से भी

गिर सकता है मनुष्य !

बहुत आसान होता है

जड़ता से बिना लड़े

निष्क्रिय गिरते जाना !

.

पर हाँ

गिरना बुरा हो

ऐसा ज़रूरी नहीं –

वही गिरता है जो

उठने का प्रयास करता है,

गुरुत्वाकर्षण के खिलाफ ऊपर उठने में

गिरना तो पड़ता ही है –

एक नहीं,

कई बार !

.

ज़रूरी है तो बस ये याद रखना

कि हर पतन की एक न एक सीमा

अवश्य होती है –

गिरता पानी

किसी न किसी सतह पर जाकर

ठहर जाता है

और सड़ जाता है  !

.

उठना मुश्किल अवश्य है

पर अंतहीन नीले आकाश में

संभावनाएं असीम होती हैं,

और जीवन अंतहीन संभावनाओं का अन्वेषण नहीं

तो और क्या है ?

गिर तो कोई भी सकता है –

चाहे, बिना चाहे,

बुरा नहीं है गिरना  

पर गिर कर उठने का,

जड़ता से निरंतर लड़ने का नाम ही जीवन नहीं

तो और क्या है ?

    • prasoon
    • अक्टूबर 13th, 2010

    bahut hi badhiyaan abhishek…

    • ravi shankar
    • अक्टूबर 13th, 2010

    awesome

    • Pratiksha Sharma
    • अक्टूबर 14th, 2010

    its nyc….. bt d starting isnt very gripping…..
    though i luvd the end, especially:
    “उठना मुश्किल अवश्य है
    पर अंतहीन नीले आकाश में
    संभावनाएं असीम होती हैं,
    और जीवन अंतहीन संभावनाओं का अन्वेषण नहीं
    तो और क्या है ?”

  1. bahut hi badiya ……….

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