तुम्हारे बिना (जायें तो जायें कहाँ)


जब कभी हमें अपनी दुनिया

बिखरी नज़र आती थी,

हम तुम्हारी बिखरी सियाह ज़ुल्फों में

पनाह लेते थे;

अब यूँ है कि ये तमाम क़ायनात

खड़ी  है बाहें फैलाए हमारी ख़ातिर,

और एक जो तुम नहीं हो

तो समझ में आता नहीं,

जायें तो जायें कहाँ !

    • Pratiksha Sharma
    • नवम्बर 27th, 2010

    nice……….!!!!

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