एक छिनाल है ज़िंदगी


एक छिनाल है ज़िंदगी

पर मैं उस से मोहब्बत करता हूँ

बेइन्तहा मोहब्बत

उसके मेरे अलावा भी

कई आशिक हैं

और वह सबके पास जाती है

.

कहता हूँ उस से

क्या ज़रुरत है उसे

जाने की यहाँ वहाँ

भला कौन करता होगा और

ऐसी मोहब्बत उस से

.

कहती है

क्यूँ न जाऊं

खूब जानती हूँ मैं

तुम मर्दों को

बस पीछा करने में मज़ा आता है तुम्हें

जिस दिन आ जाउंगी सब छोड़कर

उसी दिन ख़त्म हो जायेगी

यह चाह तुम्हारी

.

मत कहना मुझसे रुकने को कभी

वरना चली जाउंगी मैं

गंगा जैसे चली गयी थी छोड़कर

शांतनु को

तुम्हें जितना मिलती हूँ मैं

बहुत है

.

मैं कहना चाहता हूँ उस से

उसका देवव्रत भी मैं ही हूँ

और उसे हमेशा प्यार करूंगा इतना ही

यही है मेरी भीष्म प्रतिज्ञा

.

फिर भी एक दिन

जब कहा उस से

रुक जाओ आज की रात

बहुत अकेला हूँ मैं

उसके बाद उसे देखा नहीं कभी

.

अब मैं हूँ

और मेरी भीष्म प्रतिज्ञा

हम दोनों को कोई नहीं समझता

और हम दोनों बहुत अकेले हैं

अतीत की शर-शय्या पर लेटे हुए

दर्द की नदी में डूबे हुए

देखते हैं उस छिनाल के स्वप्न

जो कभी पलट कर देखने भी नहीं आयी

.

एक छिनाल है ज़िंदगी

पर मैं फिर भी उस से मोहब्बत करता हूँ …

 

    • Madhuresh
    • फ़रवरी 20th, 2011

    Simply Awesm… !

  1. जिस दिन आ जाउंगी सब छोड़कर

    उसी दिन ख़त्म हो जायेगी

    यह चाह तुम्हारी

    .wah!

  2. ज़िंदगी लंपट भी है….
    बेहतर….

    • yogi saraswat
    • फ़रवरी 1st, 2013

    मत कहना मुझसे रुकने को कभी

    वरना चली जाउंगी मैं

    गंगा जैसे चली गयी थी छोड़कर

    शांतनु को

    तुम्हें जितना मिलती हूँ मैं

    बहुत है
    जिंदगी को लोग कई कई रूपों में परिभाषित करते आये हैं , आपने एक नया रूप दिखा दिया और सार्थक एवं सटीक ! बहुत सुन्दर शब्दों दिए हैं आपने

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