कहीं कुछ अटक गया है


कहीं कुछ अटक गया है
बहुत भीतर
.
जी मितलाता है
उलटी-सी आती है
निकलता कुछ नहीं मगर
बहुत देर हुई
हलक में
ऊँगली डाल-डाल कर
थक गया हूँ
.
कहीं कुछ अटक गया है
बहुत भीतर
.
निकलेगा ज़रूर
मगर वक़्त लगेगा
(कमबख्त निकलेगा कैसे नहीं)
फिलहाल तो लगता है
जैसे वक़्त भी
अटक गया है कहीं
एक दो तीन … कई रात पहले
आया था जो दिन
अभी बीता नहीं है
.
कहीं कुछ अटक गया है
कहीं कुछ …
    • deepti.
    • अप्रैल 9th, 2011

    us raat ko ‘mai’ atak gaya tha. bheetar k samay se sab baandh liya. jb tak ye shithil hath nahi chalenge. din badlega nahi mera.
    a haunting poem abhishek. like it.

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