वही पुराने धागे: एक ग़ज़ल


नींद हमारे पीछे-पीछे, और हम आगे-आगे हैं |

और बस यूँ ही ना जाने कितनी रातों से जागे हैं ||

.

कई एक रात हुआ ऐसा भी, अपने ही मन के भीतर 

पाकर सहसा अन्धकार हम, बड़े ज़ोर से भागे हैं ||

.

नये सिरे से सुलझाते हैं दिनको जिनको हम हरदम,

रातों को फिर और उलझते, वही पुराने धागे हैं ||

.

और भी हैं ऐसे यादों के चक्रव्यूह में फँसे हुए,

या इस दुनिया में एक हमही ‘अभिषेक’ अभागे हैं ||

    • Aparajita
    • जून 13th, 2012

    Love it!

      • abhishektheoutsider
      • नवम्बर 1st, 2012

      Saw your comment only today. Thank you!

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