ख़िलाफ़


तुम यहाँ धरती पर लकीरें खींचते हो,

हम वहाँ अपने लिये नये आसमान ढूंढते हैं;

तुम बनाते जाते हो पिंजड़े पे पिंजड़ा,

हम अपने पंखों में नये उड़ान ढूंढते हैं।

.

कितने ही क्यूँ न तुम्हारे पहरेदार

पिंजड़ों के दरवाज़ों पर मुस्तैद हुए हों,

भला ऐसा भी हुआ है कहीं, कि आवारा सपने

सलाखों के पीछे क़ैद हुए हों ???

.

तुम्हारी टटकी बन्दूक हमारे जिस्म पर

बेशक़ फ़तह पा सकती है,

पर हम भी तो देखें वह कौन सी गोली है,

जो हमारी रूह तक जा सकती है !

.

ख़िलाफ़ हैं हम तुम्हारे बंदूकों के, गोलियों के,

ख़िलाफ़ हैं तुम्हारे पिंजड़ों के, लकीरों के;

बस तुम्हारे नज़रिए से बयान करती हैं जो सच,

ख़िलाफ़ हैं हम उन झूठी तस्वीरों के ।

.

जब तक रहेंगे ज़ुल्म के साए हमारे घर में,

ज़ोर-ज़ोर हम चीखेंगे ये बोल ख़िलाफ़त के;

शोर बन गूंजेंगे तुम्हारी हरेक महफ़िल में,

बुरे ख्वाब बन बजेंगे ये ढोल ख़िलाफ़त के ।

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