शुतुरमुर्ग


जब उसने एक न मानी

तो हमने कहा

कि

तुम्हें हमारी बात का भरोसा न हो,

लो खुद देख लो,

पर सच की कड़वाहट का अंदाज़ा उसे

इतना था

कि भरोसा तो बाद की बात,

उसने देखने तक से इनकार कर दिया;

और तो और,

उसने हमें ही

झूठा करार किया

और चल दिया,

पर जहाँ भी गया

बात उसके मन में खटकती रही

और जितना खटकी

उसने हमें उतना और झूठा ठहराया ।

और जीता रहा वह

उस सच की उपेक्षा में

जो कि,

उसे कहीं न कहीं पता था,

है ।

ठीक वैसे ही करता रहा

बचने की कोशिश

जैसे करता है शुतुरमुर्ग

रेत में सर घुसाकर

शिकारी से ध्यान हटाकर

कि वह न देखे अगर शिकारी को,

शिकारी भी न देखेगा उसे;

बचता नहीं मगर शुतुरमुर्ग ।

एक बार अगर लग जाए पता

कि सच है,

देख लेना ही बेहतर है,

मार ही डालता है वरना ।

  1. No trackbacks yet.

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: