जीवन की नदिया


जीवन की नदिया, नयनों की नाव,

सपनों की पतवार, दो दिन की सैर ।

इस किनारे से निकले थे कल को

औ’ उस किनारे है कल जाना, खैर !

इस मझधार में कई संगी-साथी हैं,

फिर भी अकेली हर एक की नैया ।

कोई न जाने ये भँवर कितना गहरा,

किस की ये नौका, कौन है खेवैया ।

वो सच था जो उस पार छूटा कल,

या सच जो कल मिलेगा उस पार ?

या  नदिया  का  पानी  ही  है, जो है –

इस में ही भीगूँ, दूँ तन-मन न्यौछार ।

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