बीच में


इधर मैं हूँ

उधर तुम,

बीच में

एक कुछ भी नहीं है –

जो कभी हँसी बनकर

हवा में बिखर जाता है,

और कभी दीवार बनकर

खुद में ही सिमट जाता है;

और हमारे भी

कण-कण सहज होकर

घुल जाते हैं एक-रूप,

और कुछ नहीं

बीच में,

या फिर

सिमट जाते हैं

और बन जाती हैं दो ठंढी परतें –

एक तुम्हारी तरफ

एक मेरी,

और कुछ नहीं

बीच में।

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