आज भी, कभी-कभी


जिस दिन चली गयी तुम अचानक

फिर नहीं आने के लिए,

उस दिन शाम को

काँच का एक गिलास

संभालते-संभालते फिसल गया हाथ से।

अब भी याद है मुझे उसका गिरना –

गिन सकता हूँ

एक-एक nanosecond

गिलास का मेरे हाथोँ से छूटने

और फ़र्श से टकराकर

चकना-चूर होने तक।

फिर वो शीशे के टुकड़ो को बुहारकर,

उठाकर dustbin में फेंकने के बीच

न जाने कब एक छोटा-सा टुकड़ा

चुभ गया ऊँगली में।

रत्ती भर का ज़ख्म

भर गया कब का,

पर कमबख्त

कुछ तो है

जो आज भी

चुभता है

कभी-कभी

सीने में।

  1. मैं बनूँ वक़्त
    रेत सा तेरे हाथों से
    कतरा कतरा
    सरक जाऊं
    और तू
    धूल सनी हथेलियों से
    गाहे बगाहे
    मेरी कसक झाड़ा करे.
    १९/०५/२०१२

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