बेकार सा लगता है


आजकल नींद कुछ बेकार सी लगती है मुझे,
सोता हूँ तो जागना कुछ बेकार सा लगता है।
रुकता हूँ तो रुक जाना भी नहीं भाता है मुझे,
भागता हूँ तो भागना कुछ बेकार सा लगता है।।

शिकवे किये बिना ज़िन्दगी लगती है बेमानी,
बार-बार का गिला कुछ बेकार सा लगता है।
ये शब-ओ-रोज़ का आलम, ये ग़म, ये ख़ुशी,
ये तमाम सिलसिला कुछ बेकार सा लगता है ।।

न कुछ किये बिना यहाँ रहा जाता है मुझसे,
बेबसी में कर जाना कुछ बेकार सा लगता है ।
ये लम्बी उम्र तो लगती ही है बेमुरव्वत मुझे,
जीते-जी मर जाना कुछ बेकार सा लगता है ।।

चुप्पी खलती है, चुभती है बात जैसे नश्तर हो,
अनकही लिखना भी कुछ बेकार सा लगता है ।
न लिखूँ तो सफ़ा लगता है ख़ाली-सा, यूँ सफ़े पे
नज़्म का दिखना भी कुछ बेकार सा लगता है ।।

एक ही ज़िन्दगी है अगर तो कम सी लगती है,
और ये आना-जाना – कुछ बेकार सा लगता है।
कबीरा क्याकर फूटे गगरी, क्याकर टूटे माला,
साँसों का ताना-बाना कुछ बेकार सा लगता है।।

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