एक लुढ़कती हुयी गेंद है पृथ्वी

पृथ्वी एक लुढ़कती हुयी गेंद है
अंतरिक्ष के अंतहीन मैदान में
(जिसमें चल रहा है एक बहुत बड़ा खेल),
और स्वयं एक मैदान भी है पृथ्वी
जिसमें चल रहे हैं कई खेल छोटे-बड़े।
बल्कि क्योंकि लुढ़कती जा रही है गेंद,
इसलिये चल रहा है खेल।
इतना सोचना ही बस है
यह जानने के लिए
कि यह जीत-हार वाला खेल नहीं है।
फिर क्यों खेल रहे हैं हम सब इस तरह
जीतने-हारने के लिए,
जैसे बहुत कुछ दाव पर हो ?
एक लुढ़कती हुयी गेंद के भीतर
(जो खुद एक बड़े खेल का हिस्सा है)
जीतने-हारने में कोई अंतर नहीं होता।
हर जीतने-हांरने वाला खेल एक षडयंत्र है,
जिसे खेलने वालों को खेलाया जा रहा है
क्योंकि कुछ लोगों का फायदा इसी में है
कि जीतने-हारने का सिलसिला चलता रहे।
खेलना ज़रूरी है,
पर ज़रूरी है ये भी याद रखना
कि जीत-हार के परे खेलने में मज़ा और भी ज़्यादा है।
ज़रूरी है याद रखना हर खेल में
कि एक लुढ़कती हुयी जलती हुयी गेंद है पृथ्वी
जो कभी भी रुक सकती है,
बुझ सकती है।
हर खेल ख़त्म हो सकता है कभी भी,
अचानक।

 

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A proposal to change the world

The language in which it is expressed must change

If the world has to change.

All written word, must be burnt,

Deleted, if you like,

And all that has been or is spoken

Must be forgotten.

He and She and It, for example,

Need to be replaced by something else,

More neutral,

If one desires a world where gender is immaterial.

Everything material must acquire new meaning.

Some words need total annihilation,

As complete as the obliteration they cause in the world –

War, poverty, rape, exploitation, and so on.

We must re-imagine the position of Power – 

And if the preposition Over should be allowed to be used in front of Power.

Rules of grammar must rule out any possibility of

The divide between the Ruler and the Ruled,

And all syntax must be rearranged to bring to mainstream

Everyone punctuated to the margins of the world’s page.

In the new world, it should not be possible for language

To talk anything Up or Down.

I propose that a commission be instituted

To invite suggestions that will help articulate a better world

That will only speak the language of love,

Where peace is written in the very DNA of life.

As a first step, I propose that all the dictionaries be burnt

Language as we know it has to be destroyed,

If the world has to be kept from destroying itself.

Let this be our last pledge in language as we know it –

To change language itself,

Or,

Let us all take a vow of silence.

There is no point talking anymore.

 

 

डिप्रेशन

कभी कहीं कोई चीज़ रखकर भूले ही होंगे तुम भी –
खोज-खोज कर थक जाओ जिसे मगर कम्बख्त मिलती नहीं हो ?
चाभी, कोई पुरानी किताब,
किसी ने किसी और को देने के लिए दिया हो,
ऐसा कुछ सामान ?
कोई भूली हुयी याद भी हो सकती है,
दिमाग के किसी अवचेतन हिस्से में चली गयी हो जो
पहुँच के बाहर।
कभी टूटे हुये थर्मामीटर से गिरा हुआ पारा उठाने की कोशिश की है ?
बार-बार फिसल जाता है,
हाथ नहीं आता।
ऐसा ही होता है डिप्रेशन।
जैसे किसी ने ज़िन्दगी को ही रख दिया हो
कहीं किसी कोने में,
और भूल गया हो।
दिखती भी है अगर कभी तो हाथ नहीं आती,
फिसलती चली जाती है दूर कहीं
पहुँच के बाहर।

आदमी का टूटना

काँच का गिलास गिरकर चकनाचूर हो जाता है जैसे
वैसे नहीं।
पेड़ आँधी में जड़ से उखड़कर गिर जाता है जैसे
वैसे नहीं।
एक पका हुआ घाव अचानक फूट जाता है जैसे
वैसे नहीं।
दुर्घटना में कभी हड्डी-पसली टूट जाती है जैसे
वैसे भी नहीं।
आदमी टूटता है धीरे-धीरे,
और एक दिन पूरा टूट जाता है।
धीरे-धीरे वैसे,
जैसे बस आदमी ही टूट सकता है।
चनककर पड़ जाती है दरार
हो जाता है खोखला भीतर से
रिसता है क़तरा-क़तरा।
कभी जो फिर जुड़ न सके,
आदमी का टूटना होता है वैसे।

अभिलाषा

थका हुआ ये तन का चरखा
मन में बरसे पीड़ की बरखा
भीगी हुयी ये साँस की सूत,
अब और न काता जाये।

आज को आज की फ़िक्र नहीं
आज में आज का ज़िक्र नहीं
पर ये भविष्यत्और ये भूत,
दिन-रैन सताता जाये।

कैसे मैं दुनिया में आया
मैं आया या किसने लाया
ये जीवन किसकी करतूत,
कोई बात बताता जाये।

बढ़ते पीछे छूटा हूँ मैं
बनते-बिगड़ते टूटा हूँ मैं
विनती है फिर मुझे अकूत,
समय बनाता जाये।

फिर मिल जाऊँ मिट्टी में
अक्षर जैसे चिट्ठी में
मेरे होने का सबूत,
वक़्त मिटाता जाये।

मिट्टी में मिल जाऊँ मैं
फूल बन खिल जाऊँ मैं
पड़ा मेरा खाली ताबूत,
कोई दफनाता जाये।

चुप तुम, चुप मैं – एक ग़ज़ल

चुप तुम, चुप मैं, फिर भी एक आवाज़ है
ये हमारे बीच बजता कोई सुरीला साज़ है

तुम हो ग़रूर में, कि कुछ कहोगी नहीं
मगर सब सुन रहा हूँ मैं, मुझे ये नाज़ है

जो भी सुनता है ये वाक़या, हँस पड़ता है
ये गुफ़्तगू का जाने क्या, नया-सा अंदाज़ है

सब तुम्हें भी ख़बर है, सब मुझे भी ख़बर है
पर ख़ुद की ख़बर नहीं हमें क्या ख़ूब राज़ है

तुम में ही देखता हूँ मैं अपने ख़ुदा का अक्स
तुम्हारे चेहरे की इबारतों में ही मेरी नमाज़ है

तुम एक बहता दरिया हो, विशाल सागर हो
डूबता-उतराता मेरा दिल जैसे एक जहाज़ है

नींद एक गुफ़ा है

नींद एक गुफ़ा है रात के जंगल में
गुफ़ा का मुँह संकरा है बहुत
मैं लेट कर, सरक-सरक कर गुफ़ा के भीतर घुसता जाता हूँ
अंदर बहुत अँधेरा है, गुफ़ा की दीवारें काली हैं
सहसा कोई हिस्सा चमक उठता है
उन पर चित्र बने हैं
चित्रों का कोई सिर-पैर नहीं हैं
पर जाने-पहचाने से लगते हैं
ज़रा सी देर को लगता है
मैं गुफ़ा में नहीं, जंगल के किसी और ही हिस्से में हूँ
मेरी कहानी में कोई और किस्सा है, और मैं उस किस्से में हूँ
पर मैं धीरे-धीरे सरक रहा हूँ लगातार
जागता सवेरा मेरा इंतज़ार कर रहा है, उस पार।