प्यार

मुझे तुमसे सही में प्यार हो गया है
जैसे रात को देखा हो एक सपना खूबसूरत
और मुझे उस  सपने से प्यार हो गया हो
चलो कहीं दूर चलते हैं
मैं और तुम
जब तुम नहीं होती हो
तो मानो मैं उस सपने के बारे में सोच सोच कर ही मुस्कुराया करता हूँ
वक़्त थम गया है
तुमसे मिलने और नहीं मिलने के बीच और कुछ नहीं होता
न वक़्त न कुछ और
मैंने पहले महसूस किया है सुख
पर यह कुछ और है
थोड़ा ज़्यादा
कुछ पाने की अभिलाषा जाती रही
कुछ खोने का डर  भी नहीं है
दिन  महीने साल –
किसी का कुछ मायने नहीं है अब
बस तुम ही तुम हो मेरे इर्द गिर्द
हवा में फूलों की भीनी सी खुशबू की तरह
यह कब  कहाँ से शुरू हुआ मुझे नहीं पता
यह सब कब कहाँ ख़त्म होगा
मुझे परवाह नहीं
अब तुम ही हो
जो है
और कुछ नहीं है
न कुछ चुनना है
 न बिखरना
मैं जो बिखरा बिखरा था यहाँ वहाँ
तुम  में जैसे सिमट सा गया गया हूँ
मैं पहले ऐसे कभी भी कहीं गया  नहीं था
जैसे मैं तुम तक पहुँच गया हूँ
तुमको पाकर जैसे मैंने खुद को पा लिया है
अब न और कोई रास्ता है
और न किसी रास्ते की ज़रुरत
तुम्हारी आँखों में जो रौशनी है
उसी उजाले का जिसका और कोई नाम नहीं है मेरे पास
क्या यही प्यार है?
या बीती रात का वो खूबसूरत सपना है
जिसने इस तरह मेरी आँखों में घर कर लिया है
कि मैं जब चाहे उसे देख सकता हूँ
अगर उसी सपने को प्यार कहते हैं
तो हाँ मुझे प्यार हो गया है तुमसे।
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Who?

I know you can become like anyone –

A mirror on you, a mirror, you;

But tell me,

Out of all the people you become

Who makes you feel the most like you,

Who makes you become you?

Tell me,

Who can see you

In the mirror you hold for your face?

कवि

आज समझ में आयी यह बात अचानक
कि क्यों कभी कोई माँ
अपनी प्रार्थनाओं में भगवान से
यह नहीं माँगती
कि
उसका बच्चा बड़ा होकर
कवि बने, कविता लिखे,
क्यों नहीं कभी आशीष देते समय
सर पर प्यार से हाथ रखकर
कहती है कोई माँ
कि भगवान करे
तू बड़ा होकर कवि बने।
आज समझ में आयी यह बात
जब दिन भर मैं दर्द में छटपटाता रहा
और लोगों के पूछने पर भी बता नहीं पाया
कि क्यों बेवजह यूँ छटपटाता हूँ मैं।
चाहता था कि बता सकूँ,
चाहता था कि रो सकूँ,
चाहता था की बह जाए आँखों से
वह जो किसी और से कहने को शब्द नहीं थे मेरे पास।
अभिशप्त होता है कवि
लिखने को बाध्य
किसी से दुःख साझा नहीं कर पाना
उसका विकल्प नहीं
विवशता होती है।
ठीक वैसे ही जैसे कभी माँ यह नहीं कहती
कि तू बड़ा होकर पागल हो जाए,
नहीं चाह सकती वह कि उसकी आँखों का तारा
कवि बने।
उसके समझ पाने से पहले ही
बहुत पहले
जानती है माँ
कि दोनों एक ही बात है।

आज समझ में आयी यह बात अचानक
एक कविता लिखते लिखते।

आँसू

इस तरह भुलाया है तुम्हें
कि याद तुम्हारी
समझ में आती नहीं
सीधी आँसू बनकर
पलकों से टपक जाती है।
न खुद समझ पाता हूँ
न कह पाता हूँ किसी से
कि गर मैं रोया
तो भला क्यों रोया,
बस ज़रा सी ज़ुबान पर चख लेता हूँ
तुम्हारी यादों का नमक
गाहे-बेगाहे

(तुम बिन) दिवाली

कहते हैं
राम जी रावण का वध करके
जब सीता को लेकर अयोध्या लौटे
सम्पूर्ण अयोध्या नगरी दीपमालिकाओं से
सुसज्जित की गयी
लोग-बाग जमा हुए
बहुत धूम हुयी
दिन मानो त्यौहार का हो गया
तब से लोग उस दिन दिवाली मनाते हैं।
आज दिवाली की रात मैं अकेला बैठा
अपनी अनुभूतियों की राख कुरेदता हूँ
एक एक कर अपनी साँसों का जलना गिनता हूँ
तुम गयी जबसे
हर दिन रुठ गया जैसे
सोचता हूँ
आज दिवाली के दिन
जो तुम अगर आ जाओ
मेरे शरीर का कोना कोना फिर जगमगाये
विश्वास जो टूट गया है
फिर से जुटाकर
पोर-पोर से कहूँ
सियावर रामचंद्र की जय
मन का नगर फिर एक बार
दिवाली की अयोध्या हो जाए।
अँधेरी दिवाली
जहाँ रौशनी चुभती है
काटने को दौड़ती है
फिर एक बार
उजाले से भर जाए।

तुम हवा का एक तेज़ झोंका थी

तुम हवा का एक तेज़ झोंका थी
और मैं एक पत्ते की तरह
अपनी शाख से अलग होकर
तुम्हारे साथ हो लिया।
फिर तुम मुझे यहाँ-वहाँ उड़ाती फिरी,
मैं तुम्हारे साथ यहाँ-वहाँ उड़ता रहा।
फिर अचानक यूँ हुआ
कि तुम ठहर गयी,
और मैं न जाने कितने पाँवों तले कुचला गया।

मनुष्य का पेड़ हो जाना…

मनुष्य चल सकता है
यहाँ से वहाँ पहुँच सकता है
ये ज़रूरी था इसलिए
ताकि वह चलकर दूसरों से जुड़ सके
पर अब आगे बढ़ने की होड़ में
वह तोड़ रहा है सब कुछ
तो भला इसी में है कि
वह पेड़ बन जाए
और जड़ें मज़बूत करे अपनी
क्योंकि तेज़ी से चलता हुआ आदमी
उजाड़ता जा रहा है इंसानियत का जंगल
और स्वयं खोखला होता जा रहा है।
मनुष्य का पेड़ हो जाना ही अब बचा सकता है
आदमीयत को।