My wild nights are not kind to the mornings

My wild nights are not kind to the sketchy hungover mornings.
The red half cup bra lies alone on the floor
I watch it restlessly from my bed.
Kisses that lay scattered in the room
Now jump one by one into the morning light
That the curtains obscure,
Like moths to a flame.
Emptiness the size of my soul, engulfs the day,
As if to comfort it in its embrace.
Two nothings – embracing each other –
Hoping to create something –
More loneliness.
I look at it, my eyes are orphaned young twins,
They have nowhere to take what they see.
I will escape once again into a wild night
When the day ends.
There will be nothing as it is,
But there is a certain comfort in not seeing the emptiness.

बेकार सा लगता है

आजकल नींद कुछ बेकार सी लगती है मुझे,
सोता हूँ तो जागना कुछ बेकार सा लगता है।
रुकता हूँ तो रुक जाना भी नहीं भाता है मुझे,
भागता हूँ तो भागना कुछ बेकार सा लगता है।।

शिकवे किये बिना ज़िन्दगी लगती है बेमानी,
बार-बार का गिला कुछ बेकार सा लगता है।
ये शब-ओ-रोज़ का आलम, ये ग़म, ये ख़ुशी,
ये तमाम सिलसिला कुछ बेकार सा लगता है ।।

न कुछ किये बिना यहाँ रहा जाता है मुझसे,
बेबसी में कर जाना कुछ बेकार सा लगता है ।
ये लम्बी उम्र तो लगती ही है बेमुरव्वत मुझे,
जीते-जी मर जाना कुछ बेकार सा लगता है ।।

चुप्पी खलती है, चुभती है बात जैसे नश्तर हो,
अनकही लिखना भी कुछ बेकार सा लगता है ।
न लिखूँ तो सफ़ा लगता है ख़ाली-सा, यूँ सफ़े पे
नज़्म का दिखना भी कुछ बेकार सा लगता है ।।

एक ही ज़िन्दगी है अगर तो कम सी लगती है,
और ये आना-जाना – कुछ बेकार सा लगता है।
कबीरा क्याकर फूटे गगरी, क्याकर टूटे माला,
साँसों का ताना-बाना कुछ बेकार सा लगता है।।

Without You

Everything is just as it has always been.

Floyd plays in the background –

Wish You Were Here.

Autoplay on –

One sad song leads to another.

Outside, leaves sigh as they fall off

(It is not even autumn),

The night dies a thousand deaths

In pitch black darkness.

The moon hums a melancholy tune,

The stars pay no heed –

Angry dogs bark at them.

The birds, wide-eyed in their nests,

Stare sleeplessly at the night sky,

Have they died?

They do not even bat an eyelid all night.

The last train now stands parked in the shed,

It is lonely and it has nowhere to go;

People who missed it walk all the way home,

There is no one waiting for them either.

Hungry poems go off to bed,

The poet too tired to feed them words.

Without you,

Everything is just as it has always been.

 

 

 

 

 

भूली हुयी वह मुसकुराहट

पुरानी एक तसवीर देखी तुम्हारे साथ
तो याद आयी अपनी भूली हुयी वह मुसकुराहट
जिसे अब मैं बिसरा चुका हूँ।
अब तो बस ये बनावटी मुसकान है
जैसे चिपका लेते हैं लोग चेहरे पर
ज़बरदस्ती की सेल्फी खिंचवाते वक़्त।
मेरे पास भी रहती है एक तैयार हमेशा
जिसे अपने होठों के कोनों को ज़रा सा फैलाकर
ऐसे कि बस एक तरफ के दाँत दिखें थोड़े से,
मुसकुरा लेता हूँ मैं भी ज़रुरत पड़ने पर –
पहले कभी-कभी ही सही पर दिल से मुसकुराता था,
अब जब चाहिए तब मुसकुरा सकता हूँ मैं।
जब मैं छोटा था और गर्मी की छुट्टियों में नानी के गाँव जाता था
आम के मौसम में,
वहाँ रद्दी कागज़ के बदले सोनपापड़ी बेचने फेरीवाले आते थे
मैं मामा और मौसियों के पास से
रद्दी पुरानी भरी हुयी नोटबुक जमा करके बेचकर बदले में
सोनपापड़ी खरीद कर बहुत खुश होता था।
वैसी सोनपापड़ी-सी गर्म, गुदगुदी और मीठी मुसकान
मैं आखिरी बार तुम्हारे साथ ही मुसकुराया था,
आज ये तसवीर देखी तो याद आया।
अब तो मैं इस तसवीर जैसा दिखता भी नहीं,
चेहरे पर दाढ़ी उग आयी है घनी
जो दिन-बढ़ीं सफ़ेद होती जाती है,
बनावटी मुसकान छुपाने के काम आती है।
देखोगी अगर तो पहचान भी नहीं सकोगी शायद
अब तुम मुझे।

क़तरा-क़तरा पिघल रहा हूँ

क़तरा-क़तरा पिघल रहा हूँ।
मैं बरसात में जल रहा हूँ।।

तेरी यादों के मुरझाये फूल,
मैं हथेलियों में मसल रहा हूँ।।

चिकनी काई-सी एक तमन्ना,
कदम बढ़ाते फिसल रहा हूँ।।

संभलते-संभलते गिर गया,
गिरते-गिरते संभल रहा हूँ।।

मैं ख़ुद के इतना क़रीब हूँ कि,
सब कह रहे हैं बदल रहा हूँ।।

इर्द-गिर्द सब रुक गया है,
मैं इतनी तेज़ी से चल रहा हूँ।।

की ज़िन्दगी ने ऐसी कटाई,
मैं शायद कोई फसल रहा हूँ।।

लगता है अब कुछ होने को है,
न जाने क्यों यूँ मचल रहा हूँ।।

सख्त लोहा या गुदगुदा मोम,
लगातार बस अब गल रहा हूँ।।

शाम का सूरज, सुबह का चाँद,
दिन-रात बस यूँ ही ढल रहा हूँ।।

छला था मुझे एक दिन तूने जैसे,
मैं अब ज़िन्दगी को छल रहा हूँ।।

सेकंड की सूई की टिक-टिक पर
समय की तरह ही मैं टल रहा हूँ।।

दुःख

दिल टूटने का ग़म नहीं
न किसी ग़मख़्वार की ज़रुरत है
दुःख तो है दुःख की कोई वजह न होने पर भी
यूँ जिये जाने का दुःख।
शाम को यूँ बेवजह रात में तब्दील होते देखना
सुबह का बेमतलब आना
दिन का यूँ ही खाली गुज़र जाना,
ज़िन्दगी का धुएँ के गुबार में उड़ते जाना,
ये एक सिगरेट से दूसरी जलाकर
यूँ पिये जाने का दुःख।।
और ये बूझते हुए कि
इस अकारण दुःख को कोई समझ नहीं सकेगा –
किसी से अपना दुःख न कह पाने का दुःख।
उफ़! इस बेमानी ज़िन्दगी को
यूँ जिये जाने का दुःख।।

प्यार

मुझे तुमसे सही में प्यार हो गया है
जैसे रात को देखा हो एक सपना खूबसूरत
और मुझे उस  सपने से प्यार हो गया हो
चलो कहीं दूर चलते हैं
मैं और तुम
जब तुम नहीं होती हो
तो मानो मैं उस सपने के बारे में सोच सोच कर ही मुस्कुराया करता हूँ
वक़्त थम गया है
तुमसे मिलने और नहीं मिलने के बीच और कुछ नहीं होता
न वक़्त न कुछ और
मैंने पहले महसूस किया है सुख
पर यह कुछ और है
थोड़ा ज़्यादा
कुछ पाने की अभिलाषा जाती रही
कुछ खोने का डर  भी नहीं है
दिन  महीने साल –
किसी का कुछ मायने नहीं है अब
बस तुम ही तुम हो मेरे इर्द गिर्द
हवा में फूलों की भीनी सी खुशबू की तरह
यह कब  कहाँ से शुरू हुआ मुझे नहीं पता
यह सब कब कहाँ ख़त्म होगा
मुझे परवाह नहीं
अब तुम ही हो
जो है
और कुछ नहीं है
न कुछ चुनना है
 न बिखरना
मैं जो बिखरा बिखरा था यहाँ वहाँ
तुम  में जैसे सिमट सा गया गया हूँ
मैं पहले ऐसे कभी भी कहीं गया  नहीं था
जैसे मैं तुम तक पहुँच गया हूँ
तुमको पाकर जैसे मैंने खुद को पा लिया है
अब न और कोई रास्ता है
और न किसी रास्ते की ज़रुरत
तुम्हारी आँखों में जो रौशनी है
उसी उजाले का जिसका और कोई नाम नहीं है मेरे पास
क्या यही प्यार है?
या बीती रात का वो खूबसूरत सपना है
जिसने इस तरह मेरी आँखों में घर कर लिया है
कि मैं जब चाहे उसे देख सकता हूँ
अगर उसी सपने को प्यार कहते हैं
तो हाँ मुझे प्यार हो गया है तुमसे।

Who?

I know you can become like anyone –

A mirror on you, a mirror, you;

But tell me,

Out of all the people you become

Who makes you feel the most like you,

Who makes you become you?

Tell me,

Who can see you

In the mirror you hold for your face?

कवि

आज समझ में आयी यह बात अचानक
कि क्यों कभी कोई माँ
अपनी प्रार्थनाओं में भगवान से
यह नहीं माँगती
कि
उसका बच्चा बड़ा होकर
कवि बने, कविता लिखे,
क्यों नहीं कभी आशीष देते समय
सर पर प्यार से हाथ रखकर
कहती है कोई माँ
कि भगवान करे
तू बड़ा होकर कवि बने।
आज समझ में आयी यह बात
जब दिन भर मैं दर्द में छटपटाता रहा
और लोगों के पूछने पर भी बता नहीं पाया
कि क्यों बेवजह यूँ छटपटाता हूँ मैं।
चाहता था कि बता सकूँ,
चाहता था कि रो सकूँ,
चाहता था की बह जाए आँखों से
वह जो किसी और से कहने को शब्द नहीं थे मेरे पास।
अभिशप्त होता है कवि
लिखने को बाध्य
किसी से दुःख साझा नहीं कर पाना
उसका विकल्प नहीं
विवशता होती है।
ठीक वैसे ही जैसे कभी माँ यह नहीं कहती
कि तू बड़ा होकर पागल हो जाए,
नहीं चाह सकती वह कि उसकी आँखों का तारा
कवि बने।
उसके समझ पाने से पहले ही
बहुत पहले
जानती है माँ
कि दोनों एक ही बात है।

आज समझ में आयी यह बात अचानक
एक कविता लिखते लिखते।

आँसू

इस तरह भुलाया है तुम्हें
कि याद तुम्हारी
समझ में आती नहीं
सीधी आँसू बनकर
पलकों से टपक जाती है।
न खुद समझ पाता हूँ
न कह पाता हूँ किसी से
कि गर मैं रोया
तो भला क्यों रोया,
बस ज़रा सी ज़ुबान पर चख लेता हूँ
तुम्हारी यादों का नमक
गाहे-बेगाहे